क्या आप जानते हैं भगवान् शिव की एक पुत्री भी थी? आखिर वह कौन थी और उसके बारे में हम क्या जानते हैं

कैलाशपति शिव और माता पार्वती के बारे में कौन नहीं जानता| भगवान् नीलकंठ और माता पार्वती के दो पुत्र थे गणेश और कार्तिकेय परन्तु शायद ही आप को पता हो की की उनकी एक पुत्री भी थी| जी हाँ जब माता पार्वती के दोनों पुत्र बड़े हो गए तो दोनों कैलाश छोड़ कर चले गए| ज्ञात हो की शिव अधिकाँश समय समाधि में ही लीन रहते थे ऐसे में माता पार्वती स्वयं को बहुत ही अकेला महसूस करती थी| एक दिन भगवान् शिव ने सोचा क्यों न पार्वती को कहीं घुमाने ले जाया जाये जिससे इनका मन भी बहल जायेगा|

ये सोच कर भगवान् शिव माता पार्वती के संग सृष्टि के सबसे सुन्दर उद्यान नंदनवन पंहुचे जहाँ कल्पवृक्ष नामक पेड़ था| कल्पवृक्ष के बारे में कहा जाता है की कल्पवृक्ष किसी की भी तीन इच्छाएं पूरी कर सकता था| उद्यान में घूमते हुए माता पार्वती की नज़र कल्पवृक्ष पर पड़ी पार्वती ने उत्सुकतावश कल्पवृक्ष से कहा हे कल्पवृक्ष दोनों पुत्रों के कैलाश छोड़ कर चले जाने के बाद मैं बहुत ही अकेली हो गयी हूँ| कृपा कर के मुझे एक पुत्री दे दो जिससे मैं अपने सारे सुख दुःख बाँट सकूं अपने मन की सारी बात उससे कह कर मन हल्का कर सकूं|

इतना कहते हुए माता पार्वती की आँखों से आंसू की एक बूँद कल्पवृक्ष की जड़ पर गिरी और अचानक ही बिजली चमकी और एक बड़ी ही सुन्दर सी बच्ची उनके सामने थी जो रोने की बजाये मुस्कुरा रही थी| उसके मुस्कुराने से माता पार्वती का सारा शोक नष्ट हो गया चारो ओर माहौल खुशनुमा हो गया पेड़ों से फूल बरसने लगे पक्षी मधुर ध्वनि में चहकने लगे| ऐसा लग रहा था जैसे सारी सृष्टि ही उस बालिका के आने का उत्साह मना रही हो|

माता पार्वती ने कहा की जिसके आते ही सारा शोक नष्ट हो जाए और सुन्दरता देख कर किसी की भी आँखें चुंधिया जाए ऐसी बालिका का नाम अशोक सुंदरी होना ही होना चाहिए| माता पार्वती उस बालिका के आने से बड़ी प्रसन्न हुई उन्होंने कहा की मैं इसका विवाह ऐसे राजा से करूंगी जो की इंद्र के सामान ख्याति और बल वाला होगा| दोनों भाई अशोक सुंदरी को बहुत ही चाहते थे अशोक सुंदरी वैसे तो दोनों को प्रिय थी परन्तु कार्तिकेय का अपनी बहन से विशेष लगाव था|

बड़ी होने पर अशोक सुंदरी का विवाह चन्द्रवंश के राजा नहुष से हुआ जो की बड़े प्रतापी राजा थे| एक बार इंद्र ने जब कुछ दिनों के लिए स्वर्ग के कार्यों से अवकाश लिया था तो वो नहुष ही थे जिन्होंने उनकी अनुपस्थिति में देवलोक और देवराज इंद्र का कार्यभार संभाला था| ये कथा गुजरात की प्रचलित दंतकथाओं में से एक है आज भी बड़े बुजुर्ग अपनों नाती पोतों को देवी अशोक सुंदरी की कहानी बड़े भक्तिभाव से सुनाते हैं|

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